इतिहास
विजयनगर की कहानी
आपके आसपास के ये खंडहर दो सौ साल तक दुनिया के सबसे बड़े शहरों में से एक थे। यह शहर कैसे बसा, कैसे बढ़ा, कैसे उजड़ा और फिर कैसे दोबारा सामने आया, यह सब यहाँ है।
युगों में नीचे की ओर स्क्रॉल करें, या सीधे किसी युग पर जाएँ। हर घटना के साथ उस समय के उन स्मारकों के लिंक हैं जिन्हें आप आज भी देख सकते हैं।
संगम वंश
1336 से 1485
दो भाई तुंगभद्रा के किनारे एक शहर बसाते हैं, और उनका परिवार उसे एक साम्राज्य की राजधानी बना देता है।
हरिहर और बुक्का ने शहर बसाया
संगम परिवार के भाई हरिहर प्रथम और बुक्का राय तुंगभद्रा के दक्षिणी तट पर विजयनगर, यानी विजय का नगर, बसाते हैं। परंपरा इसकी स्थापना को संत विद्यारण्य से जोड़ती है। उनके आने तक विरुपाक्ष मंदिर पहले से ही पुराना हो चुका था।
तारीख़ लिखा हुआ एक जैन मंदिर
राजा हरिहर द्वितीय के मंत्री इरुगप्पा कुंथुनाथ का जैन मंदिर बनवाते हैं। इसके ऊँचे दीप-स्तंभ पर लिखा शिलालेख साल बताता है, इसलिए यह शहर की सबसे पुरानी तारीख़ वाली इमारतों में से एक है।
देवराय प्रथम गद्दी पर बैठते हैं
राजकेंद्र के बीच बना हज़ार राम मंदिर, जो राजपरिवार का अपना मंदिर था, आम तौर पर इन्हीं के शासनकाल का माना जाता है। इसकी दीवारों पर घोड़ों, हाथियों और नर्तकियों के जुलूस उकेरे गए हैं।
हैरान रह गया फ़ारस का दूत
फ़ारस के दूत अब्दुर रज़्ज़ाक़ देवराय द्वितीय के दरबार में आते हैं। वे शहर को घेरती दीवारों की कतारों और जवाहरात से भरे बाज़ारों के बारे में लिखते हैं, और कहते हैं कि ऐसी जगह उन्होंने कहीं नहीं देखी।
सालुव वंश
1485 से लगभग 1505
एक ताक़तवर सेनापति गद्दी संभालता है और साम्राज्य को बिखरने से बचाता है।
सालुव नरसिंह सत्ता संभालते हैं
आख़िरी संगम राजा कमज़ोर हैं और साम्राज्य बिखर रहा है। ताक़तवर सेनापति सालुव नरसिंह गद्दी संभालते हैं और उसे फिर एक शासन के नीचे लाते हैं।
तुलुव वंश
लगभग 1505 से 1570
कृष्णदेवराय और उनके भाई के समय में शहर के सबसे शानदार साल, और फिर उसका पतन।
लगभग 1505
तुलुव परिवार सत्ता में आता है
सेनापति तुलुव नरस नायक के बेटे वीर नरसिंह गद्दी पर बैठते हैं। शहर के सबसे अच्छे सालों में इसी परिवार का राज रहता है।
कृष्णदेवराय का राज्याभिषेक
वे 1529 तक राज करते हैं और साम्राज्य के सबसे महान राजा के रूप में याद किए जाते हैं, जिन्होंने युद्ध जीते और कवियों को आश्रय दिया। विट्ठल मंदिर का बहुत सारा काम इन्हीं के समय का माना जाता है, और नरसिंह की विशाल मूर्ति भी इन्हीं के शासन में गढ़ी गई।
विरुपाक्ष के लिए नया मंडप
अपने राज्यारोहण की याद में कृष्णदेवराय विरुपाक्ष मंदिर के गर्भगृह के सामने खंभों वाला मंडप बनवाते हैं। भीतरी गोपुरम भी इसी साल का है, और माना जाता है कि वह भी उन्हीं का बनवाया हुआ है।
पूरब में जीत
कृष्णदेवराय गजपति राजाओं से उदयगिरि का क़िला जीतते हैं। कृष्ण मंदिर में 1513 का एक शिलालेख उनकी जीतों का ब्योरा देता है, और मंदिर के सामने एक बाज़ार की गली बस जाती है।
रायचूर की लड़ाई
कृष्णदेवराय बीजापुर के इस्माइल आदिल शाह को हराकर रायचूर का क़िला ले लेते हैं। यह उनके शासन की बड़ी जीतों में से एक है।
लगभग 1520
डोमिंगो पाइस ने देखी महानवमी
पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पाइस शहर का और हाथी-घोड़ों के जुलूसों वाले नौ रातों के महानवमी उत्सव का वर्णन करते हैं। राजा यह उत्सव राजकेंद्र के बड़े पत्थर के चबूतरे से देखते थे।
भाई के बाद अच्युतराय
कृष्णदेवराय के निधन के बाद उनके भाई अच्युत देवराय 1542 तक राज करते हैं। शहर में निर्माण का काम चलता रहता है।
अच्युतराय मंदिर
उनके शासन में मातंग पहाड़ी के पास की एक घाटी में विष्णु के रूप तिरुवेंगलनाथ का बड़ा मंदिर बनता है। एक लंबी बाज़ार गली उस तक जाती है।
राजा के नाम पर रामराय का शासन
राजा सदाशिवराय हैं, पर असली ताक़त कृष्णदेवराय के दामाद अलिय रामराय के हाथ में है, जो बीस से ज़्यादा साल तक शासन चलाते हैं।
तालीकोटा की लड़ाई
जनवरी में दक्कन की सल्तनतें मिलकर विजयनगर की सेना को हरा देती हैं। इस लड़ाई को रक्कस-तंगडी की लड़ाई भी कहते हैं। रामराय पकड़े जाते हैं और मार दिए जाते हैं।
शहर की लूट
लड़ाई के बाद महीनों तक शहर को लूटा और जलाया जाता है, और वह फिर कभी राजधानी नहीं बनता। नरसिंह की मूर्ति बुरी तरह टूट जाती है। कमल महल और हाथीखाने जैसी कुछ इमारतें लगभग पूरी बची रहती हैं।
अरविडु वंश
1570 से 1600 के दशक के मध्य तक
साम्राज्य चलता रहता है, पर दक्षिण-पूर्व में दूर की एक नई राजधानी से।
पेनुकोंडा में नई राजधानी
रामराय के भाई तिरुमल देवराय गद्दी पर बैठते हैं और पेनुकोंडा से राज करते हैं। उनका अरविडु परिवार साम्राज्य को चलाए रखता है, पर 1600 के दशक के मध्य तक वह बिखर जाता है।
साम्राज्य के बाद
1800 से आज तक
खंडहरों का नक्शा बनता है, तस्वीरें खींची जाती हैं, खुदाई होती है और उन्हें संरक्षण मिलता है।
खंडहरों का पहला नक्शा
इंजीनियर और सर्वेक्षक कॉलिन मैकेंज़ी इस जगह का पहला सर्वे नक्शा बनाते हैं। उनकी बहुत सारी जानकारी विरुपाक्ष मंदिर के पुजारियों से मिली थी।
पहली तस्वीरें
1855 और 1856 में अलेक्ज़ेंडर ग्रीनलॉ मोम लगे काग़ज़ के नेगेटिव पर खंडहरों की तस्वीरें खींचते हैं। इनसे पता चलता है कि किसी भी मरम्मत से पहले स्मारक कैसे दिखते थे। इनमें से कुछ हम्पी बाज़ार में देखी जा सकती हैं।
1970 के दशक का मध्य
खुदाई का काम ज़ोर पकड़ता है
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और कर्नाटक का पुरातत्व विभाग मिलकर एक परियोजना शुरू करते हैं। महानवमी डिब्बा के सामने सफ़ाई और खुदाई शुरू होती है। मिली हुई बहुत सी चीज़ें अब कमलापुर के संग्रहालय में हैं।
विश्व धरोहर स्थल
यूनेस्को हम्पी के स्मारक समूह को विश्व धरोहर स्थल की सूची में शामिल करता है।
ख़तरे में विश्व धरोहर
संरक्षित इलाक़े के अंदर दो बड़े सड़क पुल बन रहे थे, इसलिए यूनेस्को हम्पी को ख़तरे में पड़ी विश्व धरोहरों की सूची में डाल देता है। पुलों का काम रोक दिया जाता है।
ख़तरे की सूची से बाहर
पुलों का काम रुकने और इस जगह की हिफ़ाज़त के लिए क़दम उठाए जाने के बाद यूनेस्को हम्पी को ख़तरे की सूची से हटा देता है।
ख़ुद आकर देखिए
इस पन्ने पर जिस भी पत्थर की बात है, वह आज भी हम्पी में कहीं खड़ा है। कोई तैयार रास्ता चुनें, या जिन जगहों को आप देखना चाहते हैं उनके हिसाब से अपने दिन की योजना बनाएँ।
तारीख़ें और निर्माताओं के नाम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, यूनेस्को और प्रकाशित इतिहास के अनुसार हैं। जहाँ इनमें मतभेद है, वहाँ हमने "लगभग" या "आम तौर पर माना जाता है" लिखा है।